हाथरास/सासनी। मोहल्ला पथवारी में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव के दौरान आचार्य संतोष कृष्ण शास्त्री ने गोवर्धन कथा का रोचक वर्णन किया। जिसे सुन श्रोता झूम उठे।
गुरूवार को कथा के दौरान आचार्य ने सुनाया कि जब देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था। इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण ने मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं मैया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है। भगवान श्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अतः ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए। गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा कर प्रलय के समान माहौल पैदा कर दिया। तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे समेत शरण लेने के लिए बुलाया।
इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलतः वर्षा और तेज हो गयी। इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें। इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्घन पर्वत की पूजा करते हैं। इस दौरान आचार्य शैलेष शर्मा, राजा परीक्षित बने उमेश शर्मा, तथा उनकी पत्नी शशि शर्मा, दीपक शर्मा, विष्णु कुमार, संतोष शर्मा, कृष्णकांत, नीरज, सुनीता, स्नेहा शर्मा, शशी शर्मा, कल्याण शर्मा, आदि मौजूद थे।
गुरूवार को कथा के दौरान आचार्य ने सुनाया कि जब देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था। इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण ने मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं मैया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है। भगवान श्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अतः ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए। गोवर्घन पर्वत की पूजा की। देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा कर प्रलय के समान माहौल पैदा कर दिया। तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे समेत शरण लेने के लिए बुलाया।
इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलतः वर्षा और तेज हो गयी। इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें। इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी। बृजवासी इस दिन गोवर्घन पर्वत की पूजा करते हैं। इस दौरान आचार्य शैलेष शर्मा, राजा परीक्षित बने उमेश शर्मा, तथा उनकी पत्नी शशि शर्मा, दीपक शर्मा, विष्णु कुमार, संतोष शर्मा, कृष्णकांत, नीरज, सुनीता, स्नेहा शर्मा, शशी शर्मा, कल्याण शर्मा, आदि मौजूद थे।


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