हाथरस। हाथरस लोकसभा सीट को लेकर आजकल चुनावी सरगर्मियों का राजनैतिक तापमान बढ़ने के साथ-साथ जनता के बीच भी चुनावी चर्चाओं का दौर पूरे शबाब पर है। सभी की निगाहें क्षेत्र के भावी सांसद की योग्यता, स्थानीयता एवं सक्रियता को खोजती नज़र आ रही हैं। असल में पिछले दो दशकों से क्षेत्र की जनता ने बाहरी, निरक्षर अथवा निष्क्रिय सांसदों का दंश झेला है, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र के विकास पहिया रुका हुआ है। यही कारण है कि जनता अब ऐसे सांसद को चुनने के मूड में नज़र आ रही है जो स्थानीय, योग्य व सक्रिय हो ताकि क्षेत्र का समुचित विकास हो सके और क्षेत्र की जनता को किसी छोटे से कार्य के लिये बाहर न भागना पड़े।फिलहाल सांसद बनने की कवायद में दो पार्टियों के घोषित उम्मीदवारों के नाम जनता के बीच मौज़ूद हैं, जो एक ही समाज से ताल्लुक रखते हैं। एक हैं सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामजीलाल सुमन, जिन्होंने अपनी कर्मभूमि आगरा को छोड़कर अपनी जन्मभूमि हाथरस को चुना है; दूसरे एनसीआर के निवासी बसपा के मनोज सोनी हैं, जो बसपा सुप्रीमो की निकटता का लाभ उठाकर, स्थानीय नेताओं को धता बताते हुये हाथरस से चुनावी मैदान में हैं। यह सर्वविदित है कि सपा के घोषित उम्मीदवार के लिये उनके अपने ही खासी मुश्किलें पैदा कर रहे हैं, जिससे जनता के बीच वे अपनी पैठ बनाने में नाकाम साबित हो रहे हैं और जनता भी ऐसी फज़ीहतों व फज़ीहतखोरों से तौबा करती नज़र आ रही है। सपा में अलग-अलग
खेमे अपनी ढपली अपना राग अलाप रहे हैं। सपा प्रत्याशी रामजीलाल सुमन संगठन के लोगों से दूरी बनाए हुए हैं। जिससे सपा संगठन के कार्यकर्त्ता उनसे काफी रुष्ट हैं। सपा कार्यकर्त्ताओं का कहना है कि रामजीलाल सुमन बिना संगठन के सहयोग से जीत का खयाल अगर देख रहे हैं तो कहीं ये उनका एक ख्वाब बनकर ही न रह जाय। सपा की मनमुटावी गुटबंदी सपा प्रत्याशी को हराने में कितनी कारगर साबित होगी ये तो तभी पता चलेगा। हालांकि सपा प्रत्याशी रामजीलाल सुमन रूठे हुए गुट को मनाने की कोशिश भी कर रहे हैं लेकिन वे रूठे हुओं को मनाने में कितने कामयाब होंगे ये भी तभी पता चल पायेगा। सूत्रों की मानें तो सपा के घोषित उम्मीदवार को बदलवाने के लिए भी पार्टी के पुरोधा पूरे जोश-ओ-ख़रोश से जुटे हुए हैं। इधर, देश भर में चल रही मोदी की आंधी के फलस्वरूप भारतीय जनता पार्टी में दावेदारों की संख्या में दिनोंदिन इज़ाफा होता जा रहा है। इसका दूसरा कारण यह भी है कि इस सीट पर विगत ढार्इ दशकों से भाजपा का ही कब्जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार को लेकर पार्टी की हुर्इ फजीहत और उसके फलस्वरूप हुर्इ पराजय को ध्यान में रखते हुए जिला संगठन से लेकर शीर्ष स्तर तक बाहरी उम्मीदवार से परहेज करता नज़र आ रहा है। बावजूद इसके बाहरी उम्मीदवारों के हौसले भी कम बुलन्द नहीं हैं, ऐसे दावेदारों में आगरा की पूर्व मेयर बेबीरानी मौर्य, आगरा के मेयर इन्द्रजीत आर्य, कोल की पूर्व विधायक रामसखी कठेरिया, विवादों से घिरे जलेसर के पूर्व विधायक कुबेरसिंह अगरिया, स्वरूपसिंह बंजारा, अमरसिंह माहौर,अशोक प्रधान आदि के नाम हैं। भाजपा के स्थानीय दावेदारों में बागला डिग्री कॉलेज के रीडर डॉ. चन्द्रशेखर रावल, पूर्व सांसद डॉ. बंगाली सिंह, रामवीरसिंह भैयाजी,रमेशचन्द रत्न इसी विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी राजेश कुमार दिवाकर एवं वासुदेव माहौर के नामों की चर्चायें हैं। वैसे सच तो यह है कि जनता की भावना भी स्थानीय व योग्य प्रत्याशी को लोकसभा में भेजने की बन रही है, फिर दल चाहे जो भी हो। अब भाजपा के सामने अपनी परम्परागत सीट को बचाने की चुनौती होगी लेकिन यदि भाजपा ने विधानसभा वाली गलती दोहराते हुए गलत उम्मीदवार का चुनाव कर लिया तो परिणाम अप्रत्याशित और विपरीत हों तो कोर्इ आश्चर्य नहीं।बात कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल की करें तो यह स्पष्ट हो चुका हैं कि दोनों इस बार आपसी गठबन्धन से चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में इस सीट पर राष्ट्रीय लोकदल का दावा इसलिए अधिक मजबूत बनता है क्योंकि वर्तमान सांसद उनकी रही हैं। यह बात अलग है कि हाथरस की वर्तमान सांसद सारिका सिंह जो भाजपा व रालोद गठबन्धन के सहारे इस मुकाम को पा सकीं थीं, ने अब राष्ट्रीय लोकदल से नाता तोड़कर सूबे के सत्तानशीन दल से रिश्ता जोड़ लिया है। यही रालोद की वह कमजोरी है जिसके कारण कांग्रेस से पूर्व विधायक हरीशंकर माहौर एवं पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेशराज जीवन ने भी दमदारी से अपना दावा ठोंक दिया है। उधर, राष्ट्रीय लोकदल से टिकिट मांगने वालों की सूची भी कम लम्बी नहीं है, लेकिन वहां भी स्थानीय प्रत्याशी के सवाल पर स्थानीय संगठन से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक गम्भीर है। यों राष्ट्रीय लोकदल के दावेदारों में एक ब्राह्मण परिवार की वधू श्रीमती शामल पाटिल धनगर, विवादों से घिरे इगलास के वर्तमान विधायक त्रिलोकीराम दिवाकर के पुत्र उमेश कुमार दिवाकर, अलीगढ़ के पूर्व जिला उपाध्यक्ष रामस्वरूप कोरी, चन्द्रप्रकाश सूर्यवंशी, रामप्रकाश दिवाकर उर्फ मुन्ना प्रधान, श्रीमती कृष्णादेवी धोबी, प्रेमसिंह जाटव, मनोज कुमार, राजीव दिवाकर, एवं शीशपाल वाल्मीकि इत्यादि के नामों की चर्चायें हैं। फिलहाल क्षेत्रीय जनता इन पार्टियों के उम्मादवारों की ओर टकटकी लगाये बैठी है और यह भी निश्चित है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनता की पहली पसन्द स्थानीय एवं योग्य उम्मीदवार ही होगा, क्योंकि जनता अब विकास और अपने बीच का सांसद चाहती है। अब यह पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व को सोचना है कि उन्हें ‘गणेश परिक्रमा’ करने वालों को अपना उम्मीदवार घोषित करना है अथवा पार्टी हित में जनता की पसन्द का जिताऊ और टिकाऊ उम्मीदवार।
हाथरस लोकसभा के लिए चुनावी उठा-पटक का दौर शुरू, योग्य एवं स्थानीय प्रत्याशी जनता की पहली पसन्द
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