हाथरस/सिकंदराराव। राष्ट्र अस्मिता साहित्य संस्था की मासिक गोष्ठी दाऊजी मंदिर प्रागण में गोपाल शर्मा की अध्यक्षता एवं देवेन्द्र दीक्षित शूल के संचालन में हुई। जिसमें काव्यपाठ के साथ कविता के गुण-धर्म पर भी चर्चा हुई।
कवियों ने कहा कि प्रत्येक कवि के लिए राष्ट्रचिंतन करना परम आवश्यक है। जब राष्ट्र नहीं रहेगा तो कवियों का अस्तित्व ही अर्थहीन हो जाएगा। गोष्ठी में कवियों को सम्मानित किया गया। गोष्ठी की शुरुआत कवि आशुतोष की सरस्वती वंदना से हुई, अक्षय श्रोत ज्ञान का विराजै कमलासन, मेरी अंजुली में मा ज्ञान वारि भर दे।
रंजीत सिंह पौरुष ने सुनाया, बेटी को अभिशाप समझने वालों, कन्या भ्रुणों को पैरों से कुचलने वालों, सृष्टि सृजन निर्माण बेटियों ने किया है, अपनी सासों से नया जीवन दिया है।
ओमप्रकाश सिंह ने सुनाया, तन बूढ़ा हो जाता है, क्यों नहीं होता बूढ़ा मन, इच्छाओं की गठरी हरदम लादे रहता है क्यों जीवन भर। भद्रपाल सिंह चैहान ने सुनाया, कविता कवि का गीत नहीं हैं, उसके गुण की पीर है, पता नहीं लगता है इस में किस बदली का नीर है।
देवेन्द्र दीक्षित शूल ने सुनाया, आज दुश्मन देश भारती की शक्ति से डर रहे, विश्व के लोग भारत के योग को कर रहे। अध्यक्षता कर रहे गोपाल शर्मा ने ब्रजभाषा के कवि कुंवरपाल शर्मा को यूं श्रद्धासुमन अर्पित किया, अद्भुत रोचकता भरे ब्रजभाषा के छन्द, पृष्ठों पर अब हो गये सदा-सदा को बंद। कवि प्रेम सिंह प्रेम ने भी काव्य पाठ किया। अंत में कवियों ने दिवंगत कवि कुंवरपाल शर्मा कुंवर को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर विवेक शील, पीयूष कुमार, लालाभैया, मनोज गोदानी, मनोज माहेश्वरी, शिवम माहेश्वरी, प्रवीन दीक्षित, नितिन दीक्षित, मनोज शर्मा आदि मौजूद थे।
कवियों ने कहा कि प्रत्येक कवि के लिए राष्ट्रचिंतन करना परम आवश्यक है। जब राष्ट्र नहीं रहेगा तो कवियों का अस्तित्व ही अर्थहीन हो जाएगा। गोष्ठी में कवियों को सम्मानित किया गया। गोष्ठी की शुरुआत कवि आशुतोष की सरस्वती वंदना से हुई, अक्षय श्रोत ज्ञान का विराजै कमलासन, मेरी अंजुली में मा ज्ञान वारि भर दे।
रंजीत सिंह पौरुष ने सुनाया, बेटी को अभिशाप समझने वालों, कन्या भ्रुणों को पैरों से कुचलने वालों, सृष्टि सृजन निर्माण बेटियों ने किया है, अपनी सासों से नया जीवन दिया है।
ओमप्रकाश सिंह ने सुनाया, तन बूढ़ा हो जाता है, क्यों नहीं होता बूढ़ा मन, इच्छाओं की गठरी हरदम लादे रहता है क्यों जीवन भर। भद्रपाल सिंह चैहान ने सुनाया, कविता कवि का गीत नहीं हैं, उसके गुण की पीर है, पता नहीं लगता है इस में किस बदली का नीर है।
देवेन्द्र दीक्षित शूल ने सुनाया, आज दुश्मन देश भारती की शक्ति से डर रहे, विश्व के लोग भारत के योग को कर रहे। अध्यक्षता कर रहे गोपाल शर्मा ने ब्रजभाषा के कवि कुंवरपाल शर्मा को यूं श्रद्धासुमन अर्पित किया, अद्भुत रोचकता भरे ब्रजभाषा के छन्द, पृष्ठों पर अब हो गये सदा-सदा को बंद। कवि प्रेम सिंह प्रेम ने भी काव्य पाठ किया। अंत में कवियों ने दिवंगत कवि कुंवरपाल शर्मा कुंवर को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर विवेक शील, पीयूष कुमार, लालाभैया, मनोज गोदानी, मनोज माहेश्वरी, शिवम माहेश्वरी, प्रवीन दीक्षित, नितिन दीक्षित, मनोज शर्मा आदि मौजूद थे।
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