सासनी/हाथरस। केएल जैन इंटर कालेज परिसर में श्रीमद्भगवत सेवा समिति एवं ग्रामीण क्षेत्र के बैनर तले आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह पारायण ज्ञान महायज्ञ के दौरान विश्व विख्यात भागवत भाष्कर ब्रज गौरव श्री कृष्णचंद शास्त्री ठाकुर जी महाराज ने माता जड़भरत कथा एवं अजामिलोख्यापन एवं भक्त प्रहलाद चरित्र के साथ नृसिंह अवतार की कथा का बड़े ही रोचक ढंग से वर्णन किया।
श्रीमद्भागवत सप्ताह पारायण ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन आचार्य ठाकुर जी महाराज ने कथा के दौरान जड़भरत की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि राजा जड़भरत की डोली को जब एक साधु ने कंधा दिया तो मार्ग में साधु के चलने पर डोली हिलने लगी तो राजा ने क्रोध कर साधु को फटकार लगाना शुरु कर दिया तो साधु ने कहा कि राजन जो तुम हो वही मैं हूं इस प्रकार जब साधु महाराज ने राजा को आत्मज्ञान दिया। राजा जड़भरत एक समृद्ध ज्ञानी हो गये। उन्होंनें अपने महल राजकाज तथा संसार को छोड़कर जंगलों में चले गये, जहां प्रभुभक्ति में लीन हो गये। वहीं दूसरी ओर अजामिल नामक ब्राह्मण अपने मार्ग से भटककर वैश्या के जाल में फंस गया। उसके खर्चे पूरे करने के लिए अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया और एक नामचीन डाकू बन गया। घर पर आए संतो ने उससे दक्षिणा में उसके होने वाले पुत्र का नाम नारायण रखना मांगा। इस पर जब डाकू अजामिल का अंत आया तो यमदूत खींचने लगे। इस पर डाकू अजामिल ने जब अपने पुत्र नारायण को पुकारा तो भगवान के दूत आ गये। यमदूतों और भगवान के दूतों में झगड़ा हो गया। आखिर भगवान के दूत डाकू अजामिल की आत्मा को अपने साथ ले गये, जहां उसे भागवत की प्राप्ति हुई। कथा का भावार्थ बताते हुए आचार्य ने सुनाया कि यदि हम सच्चे मन से सत्संग भी करते या सुनते हैं तो भगवान की प्राप्ति के साथ-साथ हमें निश्चित रुप से मोक्ष प्राप्ति होती है। कथा श्रवण के दौरान राजा परीक्षित बने महेन्द्र सिंह सोलंकी व उनकी पत्नी अंजली सोलंकी, महेश नंदन अग्रवाल, संजय सिंह सेंगर आदि सैकड़ों भक्त मौजूद थे।
श्रीमद्भागवत सप्ताह पारायण ज्ञान महायज्ञ के तीसरे दिन आचार्य ठाकुर जी महाराज ने कथा के दौरान जड़भरत की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि राजा जड़भरत की डोली को जब एक साधु ने कंधा दिया तो मार्ग में साधु के चलने पर डोली हिलने लगी तो राजा ने क्रोध कर साधु को फटकार लगाना शुरु कर दिया तो साधु ने कहा कि राजन जो तुम हो वही मैं हूं इस प्रकार जब साधु महाराज ने राजा को आत्मज्ञान दिया। राजा जड़भरत एक समृद्ध ज्ञानी हो गये। उन्होंनें अपने महल राजकाज तथा संसार को छोड़कर जंगलों में चले गये, जहां प्रभुभक्ति में लीन हो गये। वहीं दूसरी ओर अजामिल नामक ब्राह्मण अपने मार्ग से भटककर वैश्या के जाल में फंस गया। उसके खर्चे पूरे करने के लिए अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया और एक नामचीन डाकू बन गया। घर पर आए संतो ने उससे दक्षिणा में उसके होने वाले पुत्र का नाम नारायण रखना मांगा। इस पर जब डाकू अजामिल का अंत आया तो यमदूत खींचने लगे। इस पर डाकू अजामिल ने जब अपने पुत्र नारायण को पुकारा तो भगवान के दूत आ गये। यमदूतों और भगवान के दूतों में झगड़ा हो गया। आखिर भगवान के दूत डाकू अजामिल की आत्मा को अपने साथ ले गये, जहां उसे भागवत की प्राप्ति हुई। कथा का भावार्थ बताते हुए आचार्य ने सुनाया कि यदि हम सच्चे मन से सत्संग भी करते या सुनते हैं तो भगवान की प्राप्ति के साथ-साथ हमें निश्चित रुप से मोक्ष प्राप्ति होती है। कथा श्रवण के दौरान राजा परीक्षित बने महेन्द्र सिंह सोलंकी व उनकी पत्नी अंजली सोलंकी, महेश नंदन अग्रवाल, संजय सिंह सेंगर आदि सैकड़ों भक्त मौजूद थे।
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