हाथरस। ब्रज क्षेत्र के लक्खी मेला श्री दाऊजी महाराज में हास्य की बौछार हुई, गीतों की फुहार चली और ओज की हुंकार भरी गई। अपनी काव्य प्रतिभा से देश-विदेशों में हाथरस का नाम रोशन करने वाले पद्म श्री काका हाथरसी व निर्भय हाथरसी की स्मृति में आयोजित हुए कवि सम्मेलन को कश्मीर में हुई आतंकी घटना की जानकारी पर देश के 17 अमर शहीदों को समर्पित कर दिया गया। भोर तक चले कवि सम्मेलन में श्रोता कवियों को सुनने के लिए दिल थाम कर बैठे रहे और तालियों की गड़गड़ाहट से उनका उत्साह वर्धन करते रहे। अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आगाज ही सांप्रदायिक सद्भाव की मिशाल पेश करने वाला रहा। सरस्वती वंदना दिल्ली से आईं देश विख्यात मुस्लिम गजलकार अना देहलवी ने की। इनके बाद श्योपुर से आए ओजकवि मांगीलाल मरमिट ने पाकिस्तान पर हुंकार भरी-
दानवों से कैसी सद्भावना, भाई-भाई भारत कहत कटवाए
शीश...
भोपाल से आए हास्य कवि धूमकेतु मंच संचालन के साथ ही अपना काव्य हुनर भी दिखाते रहे। उन्होंने देश के
हालात का चित्रण कुछ इस तरह किया...
कल्लू की रोटी, छमिया की दाल,
भूखे ही सोते हैं उसके गोपाल।
अंधेरी बस्ती अंधेरे मेहमान,
अंधेरे सजाते है ऊंची दुकान।
पन्ना से आए व्यंग्यकार डा. सुरेश पराग ने अपनी व्यंग्य रचनाओं से देश और समाज के विभन्न हालातों पर प्रहार कर खूब तालियां बटोरीं।
सतना से आईं गीतकार मणिमाला त्रिपाठी ने सुरीली तान छेड़ी तो पूरा पंडाल वाह-वाह से गूंजने लगा। उन्होंने कुछ इस प्रकार सुनाया-
प्रीत के गुल भी साधना से संवरते होंगे,
अत्री, अनुसुइया के तप से वो निखरते होंगे।
बड़ी पावन ये धामधूली है,
देवता शीश रखने को तरसते होंगे।
टूंडला से आए हास्य कवि लटूरी लट्ठ ने अपनी हास्य रचनाओं से श्रोताओं को लोटपोट कर दिया। उन्होंने शासन-प्रशासन व सामाजिक अव्यवस्थाओं को हास्य के जरिए इस तरह परोसा कि श्रोता हंसे भी और मनन के लिए भी मजबूर हुए-
मेरे हाथ में सिर्फ इसलिए कोई दुरूख की रेखा नहीं है.
माता पिता के अलावा मैंने किसी भगवान को देखा नहीं है।
दिल्ली से आईं गजलकार अना देहलवी ने जब माइक संभाला तो उनकी सुरीली आवाज के श्रोता दीवाने हो गए। वे भी श्रोताओं की डिमांड पूरी करती रहीं। उन्होंने सुनाया-
दिल में जो हैं मेरे अरमान भी दे सकती हूं,
सिर्फ अरमान नहीं, ईमान भी दे सकती हूं।
मुल्क से अपने मुझे इतनी मोहब्बत है अना,
मैं तिरंगा के लिए जान भी दे सकती हूं।
उनकी यह गजल काफी हिट हुई...
तनिक वतन की मिट्टी, मन गंगा का पानी।
जाति धर्म न पूछो, में लड़की हिस्दुस्तानी।
लखनऊ से आए ओजकवि वेदव्रत वाजपेई ने श्रोताओं में देशभक्ति का रस घोला। उन्होंने ने अपनी रचनाओं से न सिर्फ श्रोतओं में जोश भरा, उन्हें भारत माता की जय और वंदेमातरम् के नारे लगाने के लिए भी मजबूर कर दिया।
बलिदानों की प्रथा जुड़ी झंडे के तीनों रंगों से।
हिन्दुस्तान नहीं डरता है इन दो चार लफंगों से।
अमर तिरंगा स्वाभिमान से दुनिया भर में डोलेगा,
जहां गिरेगा खून हमारा वंदे मारतम बोलेगा।
बिजनौर से आए हास्य कवि हुक्का बिजनौरी ने माहौल को बदलते हुए समाज के तमाम गंभीर बिंदुओं को उठाते हुए जहां उन्हें हास्य में ढाला, वहीं संदेश भी दिए।
हम सब मिलावट के क्षेत्र में इतना बढ़ गए,
मिलावट के कारण कीड़े मारने की दवा में भी कीड़े पड़ गए।
बाबा निर्भय हाथरसी के परमशिष्य हास्य व्यंग्यकार प्रदीप पंडित ने श्रोताओं में देशभक्ति का संचार किया...
देश के जवानों देर मत की जिए,
पाकिस्तान में तिरंगा झंडा फहराइये।
देशभर में हाथरस की काव्य पताका फहरा रहे पैरोडीकार पदम अलबेला ने माइक संभालते ही पंडाल को लोटपोट कर दिया। उन्होंने बुढापे का चित्रण कुछ इस तरह किया-
क्या सोचते हो मुझमें कोन्फीडेंस नहीं है,
वक्त पहचानने का सेंस नहीं है,
कोनफीडेंस भी है, सेंस भी है,
वैलेडिटी भी है, पर क्या करूं
इस उम्र में वेलेन्स नहीं है।
जब भोर फंटी तो श्रोताओं की डिमांड पर कवि सम्मेलन की शान मेरठ से आए सुविख्यात ओज कवि हरिओम पंवार ने माइक संभाल लिया। उनके माइक संभालते ही श्रोता दिल थामकर बैठ गए। हरिओम पवार ने अनवरत एक घंटे काव्यपाठ किया। इस दौरान या तो पंडाल में सूई पटक सन्नाटा रहा या फीर तालियों की गड़गड़ाहट गूंजी। उन्होंने सबसे पहले कश्मीर में आतंकी हमले में शहीद हुए देश के 17 वीर जवानों को नमन किया। साथ ही इस कवि सम्मेलन को इन शहीदों के लिए समर्पित किया। उन्होंने सुनाया-
तुम भी शायद, दिल्ली शायद सिंहासन में एंठी,
क्या सत्रह जवान मरने के इंतजार में बैठी।
उन्होंने एक कुछ प्रकार सुनाया-
ये पाकिस्तानी गाल पर दो चाटे मारे होते,
यदि दो के बदले बीस शीश काटे होते।
वे कश्मीर में सैनिक शिविर पर आतंकी हमले को लेकर अपने गुस्से के गुबार रोक न सके और एक के बाद एक कविताएं सुनाकर श्रोताओं के दिलों को झकझोरकर रख दिया।
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