कोठी बेलन शाह पर मनाई गई झलकारी बाई की जन्म जयंती

हाथरस। खुब लड़ी मर्दानी के तर्ज पर वीरांगना झलकारी बाई आज भी महिलाओं की प्रेरणास्रोत हैं।  22 नवंबर 1830 को झांसी के भोजला गाँव में एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। महारानी लक्ष्मीबाई की सहयोगी व झांसी की इस महान वीरांगना को हम बारंबार नमन करते हैं।


        यह उद्गार वीरांगना झलकारी की जन्म जयंती पर बुधवार को कोठी बेलन शाह स्थित माहौर धर्मशाल पर आयोजित कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद ब्रज क्षेत्र मंत्री व पूर्व चेयरमैन हाथरस श्रीमती डौली माहौर नेअपने  विचार व्यक्त किये। उन्होंने शहीद वीरांगना के छविचित्र पर माल्यार्पण करते हुए बताया कि झलकारी बाई के पिता का नाम सदोवर सिंह और माता का नाम जमुना देवी था। माँ की मृत्यु के बाद  पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला था। वह रानी लक्ष्मीबाई की सैन्य टुकड़ी दुर्गा दल की सेनानायक थीं। अपने अंतिम समय में भी वे रानी के वेश में युद्ध करते हुए अंग्रेज़ों को गुमराह करने में सफल रही थी और लक्ष्मीबाई को अवसर मिल गया था, लेकिन अंग्रेजों के साथ वीर की भांति युद्ध करते हुए 4 अप्रैल 1857 को रण क्षेत्र में लड़ते हुए देश के लिए शहीद हो गई। इससे पूर्व उन्होंने ब्रिटिश सेना के कई हमलों को विफल किया था। यदि लक्ष्मीबाई के एक सेनानायक ने गद्दारी न की होती तो झांसी का किला ब्रिटिश सेना के लिए प्राय: अभेद्य ही रहता। भारत सरकार ने उनके नाम से डाक टिकट भी जारी किया था।
        कार्यक्रम में बासुदेव माहौर, नानक चन्द माहौर, दीपक माहौर मानेंद्र माहौर सुरेश चन्द मुन्नी देवी माहौर मुबीन खान चंचल मेहर कन्हैया लाल,  वंशी लाल, रामप्रकाश ,राजकुमार आदि ने पुष्प अर्पित कर श्रृद्धांजलि दी।

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