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हाथरस- हर घर लंका, हर जन रावण, इतने राम कहाँ से लाऊॅ

हाथरस। प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के अलीगढ़ रोड स्थित आनन्दपुरी कालोनी पर सहायक राजयोग शिक्षिका बी.के. दुर्गेश बहिन ने प्रातःकालीन क्लास में रावण और रावणत्व की जो परिभाषा बताई वह वाकई आज के युग में प्रासंगिक है। उनके अनुसार सुना था कि कभी लंका देश में रावण का राज्य था लेकिन अब तो वह हर देश, हर प्रदेश, शासन, प्रशासन और समस्त स्थानों पर व्यापक हो गया है। भगवान तो सर्वव्यापी नहीं है लेकिन आज रावण सर्वव्यापी हो गया है।
चोरी, ठगी, हिंसा, आतंकवाद, अपहरण, हत्या, गुण्डागर्दी, भ्रष्टाचार, दुराचार, रिश्वतखोरी, बेकारी, बेगारी, वेश्यावृत्ति, शिक्षा, जमीन, ड्रग्स आदि के माफिया इत्यादि सैकड़ों प्रकार के धन्धे करने और कराने वालों के रूप  में रावण और उसके सिपाहसालार असुर कुल स्वछन्द रूप से घूम रहे हैं। रावणत्व सर्वत्र उपस्थित है।
नैतिक और चारित्रिक पतन की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न तो रेलगाड़ी और न ही बस में अकेली सफर करने वाली महिला, न खेतों में मेहनत करने वाली ग्रामीण महिला न कार्यालयों, कारखानों में काम करने वाली बहिनें स्वयं को सुरक्षित महसूस करती हैं। सर्व सुख सुविधाओ से सम्पन्न, प्रकृति के पाँचों तत्वों को अपने वश में किये हुए हैं (कहा जाता था कि वायु, अग्नि, जल आदि अनेक देवतायें रावण के पलंग से बंधे हुए रहते थे अर्थात् उसकी आज्ञा प्रमाण चलने के लिए बाध्य थे वह स्थिति आज देखिये जब चाहें बटन दबाईये और पवन देवता आपकी सेवा में हवा करने के लिए प्रस्तुत, अग्नि आग के लिए और सभी प्रकृति तत्व सेवा में हाजिर हैं।  जनता जो हत्या, डकैती आदि घटनाओं के लिए बन्द अपराधियों को चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेज रही  दशहरे के अवसर पर बहुत से स्थानों पर रावण के पुतले तो गली-मौहल्लों में जलते हैं परन्तु रावणत्व नहीं जल रहा है।
---------------------------------------------------------------------------------रामायण-राम और रावण-----------------------------------------------------
तुलसीदास ने राम को इस मानस के बालकाण्ड में वर्णित चैपाई-‘‘बिनु पग चलहिं सुनहिं बिनु काना’’..में एक निराकार बिना हाथ-पैर, मुख वाले वक्ता और योगी को माना है।  ज्ञात हो कि परमपिता परमात्मा जिनका यथार्थ नाम शिव (कल्याणकारी) है उनका ही स्वकथित रूप अति सूक्ष्म ज्यार्तिबिन्दु स्वरूप माना गया है। जिसकी यादगार प्रतिमा शिवलिंग अर्थात् ज्यार्तिलिंग के रूप में सर्वत्र भारतवर्ष में पूजी जाती है।
परमपिता परमात्मा शिव ने प्रजापिता ब्रह्मा बाबा के माध्यम से बताया कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इन पाँचों विकारों में लिप्त हर स्त्री-पुरूष के सम्मिलित रूप को रावण कहा जाता है। वरन दस सिर (दशानन) और बीस भुजाओं, दो टाँगें और गर्दभ शीर्ष की बातों में एैतिहासिकता नहीं लेकिन पौराणिकता (पुराण अर्थात् माइथोलाॅजी को हिन्दी में गप्प) अधिक नजर आती है। राम अर्थात् रमणीय, भक्तों के हृदय अर्थात् मन में रमण करने वाले और रावण अर्थात् रूलाने वाला। रावण का पुतला जलाये जाने की प्रथा की कोई निश्चित समयावधि नहीं है और प्रत्येक प्रान्त मंे भी इसका प्रतीक पुतला नहीं जलाया जाता।
आज कलियुग में पुतला तो उन जीवित व्यक्तियों को जलाया जाता है जो अपने कर्मों से किसी न किसी को कष्ट पहुँचाते हैं। इससे भी कहा जा सकता है कि रावण अभी मरा नहीं है वह सर्वव्यापक होकर सभी को रूला रहा है कष्ट पहुँचा रहा है। इसलिए लोग पुतला जलाते हैं।  उत्तरकाण्ड में तुलसीदास ने वर्णन किया है -
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होहहिं कलिजुग माहिं।।
हमारा कहने का भाव केवल इतना है भैय्या कि जब तुलसीदास के अनुसार सतयुग और त्रेतायुग में अधम, दुष्ट लोग पाये ही नहीं जाते तो दस सिर और बीस भुजाओं वाला, सभी को रूलाने वाला, सीता का हरण करने वाला, माँस, मदिरा भक्षण करने वाला राक्षसराज रावण कहाँ से आ गया ? आज जन गण मन में बसे हुए रावण को निकालकर उसे जलाने की आवश्यकता है तभी रावण मरेगा।

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