हाथरस। आप सभी जानते हैं कि हमारा शरीर बीमारियों का घर है। जब तक हम घर में रहते हैं तो सही हैं। लेकिन घर से बाहर निकलते ही हवा में कई प्रकार की बीमारियां तैरती रहती हैं। जिन से बचना हमारा नामुमकिन है। लेकिन फिर भी हम सभी को बचना है।
आरपीएम डिग्री कालेज में जिला क्षयरोग अधिकारी डा. अनिल सागर वशिष्ठ द्वारा आज जिला पीपीएम कोर्डिनेटर मनोज कुमार उपाध्याय एवं सीनियर डाॅट प्लस टीबी एचआईवी कोर्डिनेटर विशाल पाठक द्वारा एनसीसी कैडेट्स एवं समस्त स्टाफ को टीबी की बीमारी एवं टीबी एचआईवी बीमारी के विषय में जागरुक किया।
डा. वशिष्ठ ने बताया कि दो हफ्ते से ज्यादा खांसी टीबी हो सकती है। टीबी दो प्रकार की होती है। फैंफड़े एवं शरीर के किसी भी अंग में जैसे गले के निचले हिस्से में गाॅठों का होना, आॅतों की टीबी, हड्डी की टीबी एव ंनाखूनों की टीबी के विषय में विस्तार से जागरूक किया। उन्होंने कहा कि कुल टीबी के रोगियों का 80 प्रतिशत फेफडे की टीबी वाले रोगी होते हैं। जो व्यक्ति टीबी का मरीज है, लेकिन सही प्रकार से टीबी की दवायें नहीं खा रहा है तो उसे एमडीआर की टीबी हो सकती है। फेफडे की टीबी की जाॅच मुख्यतः बलगम के द्वारा ही की जाती है। साथ ही इस बात से भी जागरुक किया कि यदि किसी दूध देने वाले पशुओं में टीबी का कीटाणु आ जाता है तो उसके दूध में भी टीबी के कीटाणु आ जाते हैं जिससे कच्चे दूध में भी टीबी के कीटाणु होते हैं।
जिसके लिये पूरे जनपद में 16 निःशुल्क जाॅच केन्द्र बनाये गये हैं उन पर जाकर खाॅसी वाले मरीज अपने बलगम की निःशुल्क जाॅच करा सकते हैं। यदि मरीज को टीबी निकलती है तो उस मरीज की निःशुल्क दवा शुरू तो उसी स्वास्थ्य केन्द्र से होगी लेकिन उसका डिब्बा उसके गाॅव के डाॅट प्रोवाइडर (आशा या कोई सामाजिक व्यक्ति) के चिन्हित डाॅट्स सेन्टर पर रखा जाता है और रोगी डाॅट प्रोवाइडर की देख-रेख में पूरी दवा खाता है और वह ठीक हो जाता है।
एचआईवी एड्स के विषय में भी एनसीसी के छात्र एंव छात्राओं को जागरुक किया गया। कहा कि यदि किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति का रक्त किसी बीमार व्यक्ति को चढ़ाया जाता है या एक बार प्रयोग की गयी सिरिंज की सुई का प्रयोग पुनः किसी मरीज को किया जाता है तो वह व्यक्ति भी संक्रमित हो जाता है। पहले के समय में नाक-कान छेदने वाले भी एक ही सुई का प्रयोग करते थे उससे भी एचआईवी होने का खतरा रहता है। लेकिन हमें आज के समय में ऐसा नहीं करना चाहिऐ। 9 वी वाहिनी एनसीसी हाथरस के कमान्डर आरके कौशल ने टीबी एवं एचआईवी एड्स की बीमारी के बताये गये उपचार एवं बचाव के विषय की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
आरपीएम डिग्री कालेज में जिला क्षयरोग अधिकारी डा. अनिल सागर वशिष्ठ द्वारा आज जिला पीपीएम कोर्डिनेटर मनोज कुमार उपाध्याय एवं सीनियर डाॅट प्लस टीबी एचआईवी कोर्डिनेटर विशाल पाठक द्वारा एनसीसी कैडेट्स एवं समस्त स्टाफ को टीबी की बीमारी एवं टीबी एचआईवी बीमारी के विषय में जागरुक किया।
डा. वशिष्ठ ने बताया कि दो हफ्ते से ज्यादा खांसी टीबी हो सकती है। टीबी दो प्रकार की होती है। फैंफड़े एवं शरीर के किसी भी अंग में जैसे गले के निचले हिस्से में गाॅठों का होना, आॅतों की टीबी, हड्डी की टीबी एव ंनाखूनों की टीबी के विषय में विस्तार से जागरूक किया। उन्होंने कहा कि कुल टीबी के रोगियों का 80 प्रतिशत फेफडे की टीबी वाले रोगी होते हैं। जो व्यक्ति टीबी का मरीज है, लेकिन सही प्रकार से टीबी की दवायें नहीं खा रहा है तो उसे एमडीआर की टीबी हो सकती है। फेफडे की टीबी की जाॅच मुख्यतः बलगम के द्वारा ही की जाती है। साथ ही इस बात से भी जागरुक किया कि यदि किसी दूध देने वाले पशुओं में टीबी का कीटाणु आ जाता है तो उसके दूध में भी टीबी के कीटाणु आ जाते हैं जिससे कच्चे दूध में भी टीबी के कीटाणु होते हैं।
जिसके लिये पूरे जनपद में 16 निःशुल्क जाॅच केन्द्र बनाये गये हैं उन पर जाकर खाॅसी वाले मरीज अपने बलगम की निःशुल्क जाॅच करा सकते हैं। यदि मरीज को टीबी निकलती है तो उस मरीज की निःशुल्क दवा शुरू तो उसी स्वास्थ्य केन्द्र से होगी लेकिन उसका डिब्बा उसके गाॅव के डाॅट प्रोवाइडर (आशा या कोई सामाजिक व्यक्ति) के चिन्हित डाॅट्स सेन्टर पर रखा जाता है और रोगी डाॅट प्रोवाइडर की देख-रेख में पूरी दवा खाता है और वह ठीक हो जाता है।
एचआईवी एड्स के विषय में भी एनसीसी के छात्र एंव छात्राओं को जागरुक किया गया। कहा कि यदि किसी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति का रक्त किसी बीमार व्यक्ति को चढ़ाया जाता है या एक बार प्रयोग की गयी सिरिंज की सुई का प्रयोग पुनः किसी मरीज को किया जाता है तो वह व्यक्ति भी संक्रमित हो जाता है। पहले के समय में नाक-कान छेदने वाले भी एक ही सुई का प्रयोग करते थे उससे भी एचआईवी होने का खतरा रहता है। लेकिन हमें आज के समय में ऐसा नहीं करना चाहिऐ। 9 वी वाहिनी एनसीसी हाथरस के कमान्डर आरके कौशल ने टीबी एवं एचआईवी एड्स की बीमारी के बताये गये उपचार एवं बचाव के विषय की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
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